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March 14, 2016 / kiranpatils

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं

The other day someone shared nice image — With the title of “Facebook logo meaning” and somehow it was back of my mind and while observing people for a while I found. How true it is.

https://i2.wp.com/comicsup.com/images/siglafcb2.jpg

 

And that’s when this poem came to my mind:

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं,
हमने कुछ मिसिंग पाया हैं.

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं,
समय को पानी की तरह बहाया हैं.

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं,
ट्राफिक को बढ़ता पाया हैं.

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं,
याद नहीं अपनों से कब बतियाँ हैं

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं,
याद नहीं कब भटके हुए मुसाफिर का लुत्फ़ उठाया हैं

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं,
ना किसी से टाइम पूछने के बहाने बतियाने का मौका पाया हैं

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं,
मैदान को सुना ही पाया हैं

जब से हमने सर ज़ुकाया हैं,
चौबारों पर दादाजी/चाचाजी को ही पाया हैं

इस कविता पढ़ने के लिए भी हमने सर ज़ुकाया हैं,
कोई नहीं, अब तो सर उठाओ और आपके सामने वाले से बतियाओं!

References:

 

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